अगर आप कभी किसी ऐसे इलाके में गए हो जहां चारों तरफ जंगल ही जंगल दिखाई देते हों तो आपको एक बात बहुत जल्दी समझ में आ जाएगी कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होता। बहुत सारे लोगों के लिए जंगल ही जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा होता है। शहरों में रहने वाले लोग जब कमाई की बात करते हैं तो उनके दिमाग में नौकरी, व्यापार या कोई दूसरा काम आता है लेकिन वन क्षेत्रों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए जंगल ही उनकी कमाई का जरिया होता है। कोई महुआ इकट्ठा करता है, कोई तेंदूपत्ता तोड़ता है, कोई शहद निकालता है, कोई लाख से जुड़ा काम करता है और कोई बांस के जरिए अपनी फैमिली का खर्च चलाता है। मतलब जंगल उनके लिए केवल प्राकृतिक संपत्ति नहीं बल्कि रोजी रोटी का आधार होता है।
लेकिन अब जरा एक बात को समझो। जंगलों में संसाधनों की कमी कभी नहीं रही। महुआ भी था, तेंदूपत्ता भी था, शहद भी था, लाख भी थी और दूसरे वन उत्पाद भी मौजूद थे। परेशानी कहीं और थी। परेशानी यह थी कि इन चीजों का पूरा फायदा उन लोगों तक नहीं पहुंच पाता था जो वास्तव में इन संसाधनों के सबसे करीब रहते थे। कई बार लोग दिन भर मेहनत करते थे लेकिन उन्हें अपने उत्पादों का सही दाम नहीं मिलता था। कई बार बाजार तक पहुंच नहीं होती थी। कई बार बिचौलिए ज्यादा फायदा ले जाते थे और असली मेहनत करने वाले लोगों के हिस्से में बहुत कम कमाई आती थी। यही वजह थी कि संसाधन होने के बावजूद बहुत सारे आदिवासी और वन क्षेत्र के लोग आर्थिक रूप से मजबूत नहीं बन पा रहे थे।
देख इसमें एक और महत्वपूर्ण बात समझने वाली है। जब किसी इलाके में कमाई के अवसर सीमित होते हैं तो उसका असर केवल एक व्यक्ति पर नहीं पड़ता बल्कि पूरी फैमिली पर पड़ता है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है। स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच कमजोर हो जाती है। घर की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं हो पाती। और धीरे धीरे विकास की गति भी धीमी पड़ जाती है। यही कारण है कि सरकार और नीति बनाने वाले लोगों ने यह महसूस किया कि केवल संसाधन मौजूद होना काफी नहीं है। जरूरी यह है कि उन संसाधनों का फायदा सही लोगों तक पहुंचे।
इसी सोच के साथ डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जन वन विकास स्कीम की एकस्टार्टिंग की गई। इस स्कीम का उद्देश्य केवल लोगों को आर्थिक सहायता देना नहीं है। इसका उद्देश्य लोगों को अपने ही क्षेत्र में मौजूद अवसरों का फायदा उठाने के लिए सक्षम बनाना है। मतलब यह स्कीम लोगों को यह बताने की कोशिश करती है कि जंगल केवल उपयोग करने की चीज नहीं है बल्कि सही तरीके से उपयोग किया जाए तो वही जंगल आर्थिक विकास का मजबूत आधार बन सकता है।
अभी के टाइम में जब रोजगार और कमाई के नए साधनों की जरूरत लगातार बढ़ रही है तब इस तरह की स्कीमों का महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है। क्योंकि हर व्यक्ति शहर जाकर नौकरी नहीं कर सकता। हर इलाके में उद्योग भी नहीं लगाए जा सकते। लेकिन अगर किसी क्षेत्र में जंगल मौजूद हैं तो वहां मौजूद संसाधनों के जरिए स्थानीय स्तर पर रोजगार और कमाई के अवसर जरूर पैदा किए जा सकते हैं। यही सोच इस स्कीम की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है।
अगर आप ध्यान से देखोगे तो दुनिया के बहुत सारे देशों में स्थानीय संसाधनों के आधार पर विकास करने पर जोर दिया जा रहा है। क्योंकि जब विकास स्थानीय स्तर पर होता है तो उसका फायदा भी स्थानीय लोगों को मिलता है। जन वन विकास स्कीम भी लगभग इसी सोच पर काम करती हुई दिखाई देती है। इसका उद्देश्य यह नहीं है कि लोग हमेशा सहायता पर निर्भर रहें बल्कि इसका उद्देश्य यह है कि लोग अपनी मेहनत और अपने संसाधनों के दम पर आगे बढ़ सकें।
अब जरा सोचो कि किसी गांव में बड़ी मात्रा में महुआ उपलब्ध है लेकिन वहां के लोगों को महुआ का केवल कच्चा दाम मिलता है। अगर उसी महुआ का प्रसंस्करण किया जाए, उसे बेहतर पैकेजिंग के साथ बाजार तक पहुंचाया जाए और लोगों को व्यापार से जोड़ा जाए तो उनकी कमाई कितनी बढ़ सकती है। यही बात शहद, लाख, बांस और दूसरे वन उत्पादों पर भी लागू होती है। यही कारण है कि यह स्कीम केवल संग्रहण तक सीमित नहीं रहती बल्कि मूल्य संवर्धन और बाजार से जोड़ने की दिशा में भी काम करने की कोशिश करती है।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इस स्कीम के अंदर विकास और संरक्षण दोनों को साथ लेकर चलने की कोशिश दिखाई देती है। क्योंकि अगर जंगल खत्म होंगे तो संसाधन भी खत्म होंगे और अगर संसाधन खत्म होंगे तो कमाई के अवसर भी खत्म हो जाएंगे। इसलिए यह जरूरी है कि जंगलों का उपयोग भी हो और उनका संरक्षण भी हो। यही संतुलन इस स्कीम की मूल सोच का हिस्सा माना जाता है।
आखिर डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर यह स्कीम क्यों शुरू की गई
Syama Prasad Mukherjee का नाम भारत के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि विकास केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उनका मानना था कि देश का वास्तविक विकास तब होगा जब गांव, दूरदराज क्षेत्र और आर्थिक रूप से पीछे रहने वाले समाज के अंदर मौजूद लोगों को भी आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा।
देख इसमें उनकी सोच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आत्मनिर्भरता थी। उनका मानना था कि लोगों को केवल सहायता देना पर्याप्त नहीं है बल्कि उन्हें ऐसा वातावरण देना चाहिए जिससे वे खुद मजबूत बन सकें। यही वजह है कि उनके नाम से जुड़ी कई स्कीमें विकास और आत्मनिर्भरता की सोच को आगे बढ़ाने का काम करती हैं।
जन वन विकास स्कीम भी उसी सोच का विस्तार मानी जाती है। यहां भी प्रयास यही है कि वन क्षेत्रों में रहने वाले लोग केवल सहायता प्राप्त करने वाले लोग न बनें बल्कि अपने संसाधनों के दम पर आर्थिक रूप से मजबूत बनें।
अभी के टाइम में जन वन विकास की जरूरत पहले से ज्यादा क्यों बढ़ गई है
अगर आज की स्थिति को देखा जाए तो यह साफ दिखाई देता है कि केवल खेती के भरोसे ग्रामीण विकास को आगे बढ़ाना आसान नहीं है। बहुत सारे ऐसे क्षेत्र हैं जहां खेती सीमित है लेकिन जंगलों की उपलब्धता काफी ज्यादा है। ऐसे इलाकों में वनोपज लोगों की कमाई का महत्वपूर्ण साधन बन सकती है।
लेकिन परेशानी तब आती है जब उत्पाद तो मौजूद होते हैं लेकिन बाजार तक पहुंच नहीं होती। कई बार महुआ का सही दाम नहीं मिलता। कई बार शहद बेचने में परेशानी होती है। कई बार बांस आधारित उत्पादों को खरीदार नहीं मिलते। और कई बार जानकारी की कमी लोगों की कमाई को सीमित कर देती है।
यही इसका उपाय है कि लोगों को संगठित सहायता मिले, उन्हें बाजार से जोड़ा जाए, मूल्य संवर्धन की सुविधा दी जाए और उन्हें व्यापार की बेहतर जानकारी मिले। जब ऐसा होगा तो कमाई भी बढ़ेगी और पूरे क्षेत्र का विकास भी तेज होगा।
इस स्कीम का मुख्य उद्देश्य क्या है
अगर बिल्कुल आसान भाषा में समझें तो इस स्कीम का मुख्य उद्देश्य वन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाना है।
लेकिन इसका दायरा इससे काफी बड़ा है।
इस स्कीम का पहला उद्देश्य वन आधारित आजीविका को बढ़ावा देना है।
दूसरा उद्देश्य आदिवासी और वन क्षेत्रों के लोगों की कमाई बढ़ाना है।
तीसरा उद्देश्य लघु वनोपज का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना है।
चौथा उद्देश्य स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करना है।
पांचवां उद्देश्य वन संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाना है।
जब किसी समुदाय को अपने संसाधनों से बेहतर फायदा मिलने लगता है तो उसका प्रभाव केवल कमाई तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे समाज के अंदर सकारात्मक बदलाव दिखाई देने लगते हैं।
वन आधारित अर्थव्यवस्था ग्रामीण विकास में कैसे योगदान देती है
बहुत सारे लोग जंगलों को केवल पर्यावरण से जोड़कर देखते हैं लेकिन असलियत इससे कहीं बड़ी है। जंगल लाखों लोगों की कमाई का आधार भी हैं। जब वनोपज का संग्रहण होता है तो लोगों को रोजगार मिलता है। जब प्रसंस्करण होता है तो नई आर्थिक गतिविधियां शुरू होती हैं। जब बाजार से जुड़ाव बढ़ता है तो आय बढ़ती है। और जब आय बढ़ती है तो पूरे क्षेत्र की आर्थिक स्थिति मजबूत होने लगती है।
यही कारण है कि वन आधारित अर्थव्यवस्था को ग्रामीण विकास का एक महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है।
आदिवासी समुदायों के लिए यह स्कीम इतनी महत्वपूर्ण क्यों मानी जाती है
अगर आदिवासी समाज को करीब से समझने की कोशिश की जाए तो एक बात बहुत आसानी से समझ में आ जाती है कि उनकी जिंदगी जंगलों से अलग नहीं है। बहुत सारे परिवार ऐसे हैं जिनकी कई पीढ़ियां जंगलों और वनोपज के साथ जुड़ी हुई हैं। उनके जीवन का बड़ा हिस्सा प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित रहता है।
लेकिन अभी के टाइम में केवल पारंपरिक तरीके से काम करके अच्छी कमाई करना आसान नहीं रह गया है। बाजार बदल चुका है। लोगों की जरूरतें बढ़ चुकी हैं। खर्च पहले की तुलना में काफी ज्यादा हो चुके हैं। ऐसी स्थिति में अगर लोगों को आधुनिक तकनीक, बेहतर बाजार और सही प्रशिक्षण नहीं मिलेगा तो उनकी कमाई सीमित ही रहेगी।
देख इसमें यही वह जगह है जहां यह स्कीम महत्वपूर्ण बन जाती है। क्योंकि यह लोगों को केवल वनोपज इकट्ठा करने तक सीमित नहीं रखती बल्कि उन्हें यह समझाने की कोशिश करती है कि उन्हीं उत्पादों से ज्यादा कमाई कैसे की जा सकती है।
अगर किसी इलाके में शहद उपलब्ध है तो उसे बेहतर तरीके से पैक करके बेचा जा सकता है। अगर बांस उपलब्ध है तो उससे तैयार उत्पाद बनाए जा सकते हैं। अगर लाख उपलब्ध है तो उसका मूल्य बढ़ाकर ज्यादा कमाई की जा सकती है। यही सोच इस स्कीम को महत्वपूर्ण बनाती है।
वन संरक्षण और विकास दोनों एक साथ कैसे चल सकते हैं
बहुत सारे लोगों को लगता है कि विकास होगा तो जंगलों को नुकसान होगा और अगर जंगल बचाने हैं तो विकास को रोकना पड़ेगा। लेकिन वास्तव में ऐसा जरूरी नहीं है।
देख इसमें जब स्थानीय लोगों को जंगलों से वैध और अच्छी कमाई मिलने लगती है तो वे खुद जंगलों को बचाने में ज्यादा रुचि लेने लगते हैं। क्योंकि उन्हें यह समझ में आ जाता है कि जंगल सुरक्षित रहेंगे तभी उनकी कमाई भी सुरक्षित रहेगी।
यही वजह है कि इस स्कीम की सोच केवल कमाई तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य टिकाऊ विकास को बढ़ावा देना भी है। मतलब जंगल भी सुरक्षित रहें और वहां रहने वाले लोगों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ सकता है
अगर किसी वन क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं तो उसका फायदा केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता।
जब लोगों की कमाई बढ़ती है तो स्थानीय दुकानों का व्यापार बढ़ता है।
जब प्रसंस्करण इकाइयां शुरू होती हैं तो रोजगार पैदा होते हैं।
जब महिलाओं के समूह काम करते हैं तो उनकी आर्थिक भागीदारी बढ़ती है।
जब स्वयं सहायता समूह मजबूत होते हैं तो पूरे गांव की आर्थिक स्थिति बेहतर होने लगती है।
यानी इस स्कीम का असर केवल लाभार्थी तक नहीं बल्कि पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे सकता है।
आवेदन करने से पहले किन बातों को समझ लेना जरूरी है
किसी भी सरकारी स्कीम का फायदा तभी आसानी से मिलता है जब उसकी पात्रता और प्रक्रिया को सही तरीके से समझ लिया जाए।
बहुत सारे लोग केवल नाम सुनकर आवेदन करने की सोच लेते हैं लेकिन बाद में उन्हें पता चलता है कि कुछ जरूरी शर्तें पूरी नहीं हो रही थीं या कुछ डॉक्यूमेंट अधूरे थे।
देख इसमें सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि आप उस वर्ग के अंदर आते हैं या नहीं जिसके लिए यह स्कीम बनाई गई है।
इसके बाद जरूरी डॉक्यूमेंट तैयार करने चाहिए।
और फिर आवेदन प्रक्रिया को सही तरीके से समझना चाहिए।
जितनी अच्छी तैयारी पहले से होगी उतनी कम परेशानी बाद में होगी।
आवेदन हेतु आवश्यक डॉक्यूमेंट
| क्रमांक | डॉक्यूमेंट | उपयोग |
|---|---|---|
| 1 | आधार कार्ड | पहचान सत्यापन |
| 2 | निवासी प्रमाण पत्र | निवास सत्यापन |
| 3 | जनजाति प्रमाण पत्र | पात्रता सत्यापन |
| 4 | बैंक पासबुक | लाभ राशि प्राप्ति |
| 5 | पासपोर्ट फोटो | आवेदन रिकॉर्ड |
| 6 | मोबाइल नंबर | सूचना प्राप्त करने हेतु |
| 7 | आधार लिंक बैंक खाता | DBT भुगतान |
| 8 | वन आधारित गतिविधि विवरण | परियोजना मूल्यांकन |
| 9 | स्वघोषणा पत्र | आवेदन सत्यापन |
| 10 | समूह संबंधी दस्तावेज | सामुदायिक आवेदन हेतु |
| 11 | स्थानीय प्राधिकरण प्रमाण पत्र | क्षेत्रीय सत्यापन |
| 12 | अन्य विभागीय दस्तावेज | आवश्यकता अनुसार |
आवेदन प्रक्रिया को आसान भाषा में समझें
अगर पूरी प्रक्रिया को आसान तरीके से समझा जाए तो यह कुछ इस तरह दिखाई देती है।
सबसे पहले स्कीम की जानकारी प्राप्त करनी होती है।
उसके बाद पात्रता की जांच करनी होती है।
फिर सभी जरूरी डॉक्यूमेंट तैयार करने होते हैं।
इसके बाद आवेदन करना होता है।
फिर विभाग द्वारा आवेदन की जांच की जाती है।
उसके बाद सत्यापन प्रक्रिया पूरी की जाती है।
अगर सभी शर्तें पूरी होती हैं तो आवेदन स्वीकृत किया जाता है।
और अंत में लाभार्थी को स्कीम का फायदा दिया जाता है।
देख इसमें धैर्य रखना भी जरूरी होता है क्योंकि सत्यापन प्रक्रिया में थोड़ा समय लग सकता है।
इस स्कीम के प्रमुख फायदे क्या हैं
अगर इसके फायदों को ध्यान से देखा जाए तो यह केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है।
वन आधारित आजीविका मजबूत हो सकती है।
लोगों की कमाई बढ़ सकती है।
लघु वनोपज का बेहतर उपयोग हो सकता है।
स्थानीय रोजगार बढ़ सकते हैं।
औरतो की आर्थिक भागीदारी बढ़ सकती है।
स्वयं सहायता समूह मजबूत हो सकते हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति मिल सकती है।
और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लोगों के अंदर आत्मनिर्भर बनने का विश्वास बढ़ सकता है।
आवेदन के दौरान होने वाली सामान्य गलतियां
बहुत सारे आवेदन छोटी छोटी गलतियों की वजह से प्रभावित हो जाते हैं।
सबसे सामान्य गलती अधूरे डॉक्यूमेंट जमा करना है।
दूसरी गलती गलत बैंक जानकारी देना है।
तीसरी गलती पात्रता नियमों को ठीक से न पढ़ना है।
चौथी गलती आवेदन जमा करने के बाद उसकी स्थिति की जांच न करना है।
पांचवीं गलती जरूरी प्रमाण पत्र समय पर उपलब्ध न कराना है।
अगर इन गलतियों से बचा जाए तो पूरी प्रक्रिया काफी आसान हो सकती है।
धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े से कैसे बचें
अभी के टाइम में बहुत सारे लोग सरकारी स्कीमों के नाम पर लोगों को धोखा देने की कोशिश करते हैं।
कोई लाभ दिलाने के नाम पर पैसे मांगता है।
कोई OTP मांगता है।
कोई बैंक खाते की जानकारी मांगता है।
देख इसमें हमेशा याद रखना चाहिए कि OTP किसी के साथ साझा नहीं करना चाहिए।
बैंक की निजी जानकारी सुरक्षित रखनी चाहिए।
और केवल आधिकारिक माध्यमों पर ही भरोसा करना चाहिए।
FAQ
क्या यह स्कीम आदिवासी क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है
हाँ यह स्कीम विशेष रूप से वन और आदिवासी क्षेत्रों के विकास को ध्यान में रखकर बनाई गई है।
क्या आधार कार्ड जरूरी है
हाँ पहचान सत्यापन के लिए इसकी जरूरत पड़ सकती है।
क्या बैंक खाता जरूरी होता है
हाँ क्योंकि लाभ सीधे खाते में भेजा जा सकता है।
क्या आवेदन ऑनलाइन किया जा सकता है
कई मामलों में ऑनलाइन आवेदन की सुविधा उपलब्ध हो सकती है।
क्या महिलाओं को भी लाभ मिल सकता है
हाँ औरतो के समूह और पात्र लाभार्थी इसका फायदा प्राप्त कर सकते हैं।
क्या स्वयं सहायता समूह लाभ ले सकते हैं
हाँ कई गतिविधियों में समूह आधारित भागीदारी को बढ़ावा दिया जाता है।
क्या इससे कमाई बढ़ सकती है
हाँ वन उत्पादों के बेहतर उपयोग से कमाई बढ़ने की संभावना रहती है।
क्या स्थानीय रोजगार बढ़ सकते हैं
हाँ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
क्या यह स्कीम आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देती है
हाँ यही इसकी सबसे महत्वपूर्ण सोच मानी जाती है।
क्या पर्यावरण संरक्षण को भी महत्व दिया जाता है
हाँ विकास और संरक्षण दोनों को साथ लेकर चलने की कोशिश की जाती है।
तो अब आखिर में आते हैं
अगर पूरे विषय को शुरुआत से आखिर तक देखा जाए तो एक बात बिल्कुल साफ दिखाई देती है कि डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जन वन विकास स्कीम केवल एक सरकारी स्कीम नहीं है। यह वन क्षेत्रों और आदिवासी समाज के अंदर मौजूद लोगों को मजबूत बनाने का प्रयास है।
इसका उद्देश्य केवल सहायता देना नहीं बल्कि लोगों को अपने ही संसाधनों के जरिए आगे बढ़ने का अवसर देना है। जब किसी व्यक्ति को अपने क्षेत्र में ही कमाई के बेहतर अवसर मिलने लगते हैं तो उसका असर उसकी फैमिली पर भी पड़ता है और पूरे समाज के अंदर भी सकारात्मक बदलाव दिखाई देने लगते हैं।
यही वजह है कि अभी के टाइम में इस स्कीम को ग्रामीण और वन क्षेत्रों के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
मेरी राय
मेरे हिसाब से अगर किसी स्कीम की असली ताकत को समझना हो तो यह देखना चाहिए कि वह लोगों को केवल सहायता देती है या उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने का मौका भी देती है। मुझे लगता है कि जन वन विकास स्कीम की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यह लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम करती है।
देख इसमें भारत के बहुत सारे वन क्षेत्रों के अंदर संसाधनों की कोई कमी नहीं है। महुआ है। शहद है। लाख है। बांस है। तेंदूपत्ता है। और भी बहुत सारी चीजें हैं जिनसे अच्छी कमाई की जा सकती है। लेकिन कई सालों तक परेशानी यह रही कि इन संसाधनों का पूरा फायदा स्थानीय लोगों तक नहीं पहुंच पाया। मेहनत करने वाले लोग अलग थे और ज्यादा लाभ कमाने वाले लोग अलग थे।
मुझे लगता है कि अगर किसी क्षेत्र का विकास करना है तो सबसे पहले वहां के लोगों को मजबूत बनाना जरूरी है। केवल बाहर से निवेश लाकर या सहायता देकर लंबे समय तक बदलाव नहीं लाया जा सकता। असली बदलाव तब आता है जब लोग खुद कमाई करने लगते हैं और अपने विकास का हिस्सा बनते हैं।
इस स्कीम की एक और अच्छी बात मुझे यह लगती है कि यह विकास और पर्यावरण दोनों को साथ लेकर चलने की कोशिश करती है। आज पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण की बात कर रही है। लेकिन केवल संरक्षण की बात करने से काम नहीं चलता। लोगों की जरूरतों को भी समझना पड़ता है। अगर लोगों को जंगलों से वैध और अच्छी कमाई मिलेगी तो वे खुद जंगलों को बचाने में रुचि लेंगे। यही टिकाऊ विकास की असली पहचान है।
मुझे यह भी लगता है कि आने वाले समय में वन आधारित अर्थव्यवस्था की भूमिका और बढ़ सकती है। क्योंकि लोग प्राकृतिक उत्पादों की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में अगर आदिवासी और वन क्षेत्रों के लोगों को सही प्रशिक्षण, सही बाजार और सही अवसर मिल जाएं तो उनकी आर्थिक स्थिति में बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है।
मेरी नजर में यह स्कीम केवल कमाई बढ़ाने की स्कीम नहीं है बल्कि यह आत्मसम्मान बढ़ाने वाली स्कीम भी है। क्योंकि जब कोई व्यक्ति अपनी मेहनत और अपने संसाधनों के दम पर आगे बढ़ता है तो उसके अंदर आत्मविश्वास भी बढ़ता है। यही आत्मविश्वास आगे चलकर पूरे समाज के विकास का आधार बनता है।
इसी वजह से मुझे लगता है कि अगर इस स्कीम का सही तरीके से क्रियान्वयन हो और वास्तविक लाभ सही लोगों तक पहुंचे तो यह हजारों नहीं बल्कि लाखों लोगों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव लाने की क्षमता रखती है। यही इस स्कीम की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ा महत्व है।